क्या वह प्रेम जिसका अंत शादी पर होता है, हराम (वर्जित) है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह
के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम:

वह संबंध जो एक पुरूष और गैर महरम (परायी) महिला
के बीच पैदा होता है, जिसे लोग “प्रेम” का नाम देते हैं, धार्मिक और नैतिक
निषेद्धों और वर्जित चीज़ों का एक समूह है।

किसी बुद्धिमान व्यक्ति को इस संबंध के हराम
होने में संदेह नहीं हो सकता, चुनाँचि इस के अंदर: परायी महिला के साथ एकांत
में रहना,
उसकी
ओर देखना, उसे स्पर्श और चुंबन करना, प्यार और प्रशंसा भरी वार्तालाप (बात चीत) पाई
जाती है जो भावनाओं को भड़काती और इच्छाओं को उभारती हैं। और कभी कभार यह संबंध इस से
भी बढ़कर चीज़ तक पहुँच जाता है, जैसाकि आजकल हो रहा है और उसका अवलोकन किया जाता है।
हम ने प्रश्न संख्या (84089) के उत्तर में इन हराम तत्वों की एक संख्या का उल्लेख किया
है। अतः उसे देखें।

दूसरा:

अध्ययनों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि पुरूष
और महिला के बीच पूर्व प्रेम संबंध पर आधारित अक्सर शादियाँ असफल हो गयीं हैं, जबकि
वह शादियाँ जो आम तौर पर हराम संबंध पर आधारित नहीं थीं, जिन्हें लोग “पारंपरिक
विवाह” का नाम देते हैं, अक्सर सफल रहीं हैं।

फ्रांसीसी समाज शास्त्री प्रोफेसर सियोल गोर
डोन के क्षेत्र अध्ययन का यह परिणाम सामने आया है किः

“शादी उस समय सबसे अधिक सफल रहती है जब
उसके दोनों पक्ष शादी से पूर्व प्रेम संबंध में नहीं जुड़े होते हैं।”

तथा समाज शास्त्री इसमाइल अब्दुल बारी के
1500 परिवारों पर एक अन्य अध्ययन का परिणाम यह है कि 75 प्रतिशत से अधिक प्यार की शादियों
का अंत तलाक़ पर हुआ, जबकि (तलाक़ का) यह अनुपात (स्तर) पारंपरिक विवाहों में 5 प्रतिशत
से भी कम था अर्थात् जो शादियाँ पूर्व प्रेम के अधार पर नहीं हुई थीं।

इस परिणाम तक पहुँचाने वाले महत्वपूर्ण कारणों
का उल्लेख इस प्रकार किया जा सकता है:

1- भावनात्मक आवेग दोषों के देखने और उनका सामना
करने से अंधा कर देता है, जैसाकि कहावत है: “पसंदीदगी की आँख हर दोष से कुंद होती
है।” संभव है कि दोनों पक्षों या किसी एक में कोई ऐसा दोष हो जो उसे दूसरे पक्ष
के लिए अनुपयुक्त बना देता हो, किंतु ये दोष विवाह के बाद प्रत्यक्ष होते हैं।

2- दोनों प्रेमी यह समझते हैं कि जीवन प्यार
की एक ऐसी यात्रा है जिसका कोई अंत नहीं। इसलिए हम देखते हैं कि वे केवल प्यार और सपनों
. . . के बारे में बात करते हैं। जहाँ तक जीवन की समस्याओं और उनसे निपटने के तरीक़ों
का संबंध है तो उनकी बात चीत में इनका कोई हिस्सा नहीं होता है। लेकिन शादी के बाद
यह भ्रम टूट जाता है जब वे जीवन की समस्याओं और उसकी ज़िम्मेदारियों का सामना करते हैं।

3- दोनों प्रेमी बात चीत और बहस के आदी नहीं
होते हैं, बल्कि बलिदान और दूसरे पक्ष को खुश करने के लिए अपनी इच्छा को त्यागने के
आदी होते हैं, बल्कि अक्सर उनके बीच इस कारण मतभेद पैदा हो जाता है कि उनमें से हर
एक पक्ष दूसरे पक्ष को खुश करने के लिए अपनी इच्छा को त्यागना चाहता है ! जबकि शादी
के बाद मामला इसके विपरीत होता है, और अक्सर उनकी बहस का अंत किसी समस्या पर होता है,
क्योंकि उन में से हर एक दूसरे पक्ष के विचार पर बिना किसी बहस के सहमत होने का आदी
होता है।

4- वह छवि जिसके द्वारा दोनों प्रेमियों में
से हर एक दूसरे के लिए प्रकट होता है वह उसकी वास्तविक छवि नहीं होती है, क्योंकि विनम्रता,
नरमी और दूसरे पक्ष को संतुष्ट करने के लिए त्याग और समर्पण … ही वह छवि होती है
जिसका दोनों पक्षों में से प्रत्येक तथाकथित “प्यार” की अवधि में प्रदर्शन
करने की कोशिश करता है, हालांकि अपने जीवन भर इसी छवि पर जारी नही रह सकता है। चुनांचे शादी के बाद
उसकी असली छवि सामने आती है और उसके साथ समस्याएं भी जन्म लेती हैं।

5- प्यार की अवधि अक्सर सपनों और अतिशयोक्तियों
पर आधारित होती है जो शादी के बाद की वस्तुस्थिति से मेल नहीं खाती है। प्रेमी उससे
वादा करता है कि वह उसके लिए चाँद तोड़ कर लायेगा, और वह उसे पूरी दुनिया में सब से
अधिक खुशहाल इंसान बनाकर ही संतुष्ट होगा . . . इत्यादि। इसके विपरीत . . वह उसके साथ
एक ही कमरे में और ज़मीन पर ही जीवन बिता लेगी, और यदि वह उसे मिल गया तो वह किसी चीज़
की मांग या इच्छा नहीं करेगी, और यह कि वह स्वयं उसके लिए काफी है !! जैसा कि उनके
कहने वाले ने एक प्रेमी के शब्दों में कहा है: “गौरैया का घोंसला हमारे लिए काफी
है”, “एक छोटा सा लुक्मा हमारे लिए बहुत है” तथा “मुझे पनीर का
एक टुकड़ा और एक जै़तून खिलाओ” !!! यह एक भावनात्मक कथन है जिसमें अतिशयोक्ति से
काम लिया गया है।

इसीलिए दोनों पक्ष शादी के बाद जल्द ही इस को
भूल जाते हैं या भुला देते हैं। चुनांचे औरत अपने पति की कंजूसी और अपनी मांगों की
पूर्ति न करने की शिकायत करती है, और पति मांगों और व्यय की अधिकता से उफ करता है।

इन कारणों – और इनके अलावा अन्य कारणों – से
हमें उस समय आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब शादी के बाद दोनों पक्षों में से हर एक कहता
है कि वह धोखा खा गया, और यह कि उसने जल्दबाज़ी से काम लिया। आदमी इस बात पर पछतावा
करता है कि उसने फलाँ औरत से शादी नहीं की जिसका उसके बाप ने उसे मश्वरा दिया था, तथा
औरत इस बात पर पछताती है कि उसने फलाँ आदमी से शादी नहीं की जिस पर उसके माता पिता
सहमत थे, किंतु उन्हों ने उसकी इच्छा को साकार करने के लिए उसे अस्वीकार कर दिया !

इसका परिणाम उन शादियों के तलाक़ के उच्च दर
हैं जिन्हें आयोजित करने वाले यह समझते थे कि वे दुनिया के अंदर सबसे अधिक सफल और सौभाग्यपूर्ण
शादियों के लिए उदाहरण होंगे !!!

तीसरा:

ये कारण जिनका पीछे उल्लेख किया गया है, इन्द्रियगोचर
प्रत्यक्ष कारण हैं जिनके शुद्ध होने की वस्तुस्थिति साक्षी है, परंतु हमें इन शादियों
के विफल होने के असली कारण की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, और वह यह कि ये (शादियाँ) अल्लाह
तआला की अवज्ञा पर आयोजित की गई थीं – क्योंकि इस्लाम उन पापी संबंधों का अनुमोदन नहीं
कर सकता, भले ही वे विवाह के उद्देश्य से रहे हों -, अतएव परमेश्वर की न्यायपूर्ण सज़ा
उनके घात में थी। अल्लाह तआला ने फरमाया:

]وَمَنْ أَعْرَضَ عَنْ ذِكْرِي
فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكاً
[ [سورة طه : 124]

“और
हाँ, जो मेरी याद से मुँह फेरेगा, उसके जीवन में तंगी रहेगी।” (सूरत ताहा:
124)

कष्टदायक तंग जीवन अल्लाह सर्वशक्तिमान की अवहेलना
और उसकी वह्य से उपेक्षा का परिणाम है।

तथा अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया:

] وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْقُرَى آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَيْهِمْ
بَرَكَاتٍ مِنَ السَّمَاءِ وَالأَرْضِ
[ [سورة الأعراف : 96]

“यदि
गाँव वाले ईमान लाते और ईश्भय रखते तो हम उनके ऊपर आकाश व धरती की बर्कतें (विभूतियाँ)
खोल देते।” (सूरतुल आराफ: 96)

चुनांचे अललाह की ओर से बर्कत ईमान और तक़्वा
पर एक उपहार है, इसलिए यदि ईमान और तक़्वा (ईश्भय) अनुपस्थित होती है या कम हो जाती
है तो बर्कत भी कम या समाप्त हो जाती है।

तथा अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया:

] مَنْ عَمِلَ صَالِحاً مِنْ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَى وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ
حَيَاةً طَيِّبَةً وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُمْ بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ

[
[سورة النحل : 97]

“जो
भी पुरुष या स्त्री सत्कर्म करे और वह मोमिन हो, तो निःसंदेह हम उसे उत्तम जीवन
प्रदान करेंगे और उनके अच्छे कामों का सर्वश्रेष्ठ प्रतिफल भी उन्हें अवश्य
देंगे।” (सूरतुन नह्ल: 97)

अतः, अच्छा जीवन, ईमान और अच्छे कर्मों का फल
है।

और अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान कितना सच्चा
है कि:

] أَفَمَنْ أَسَّسَ بُنْيَانَهُ عَلَى تَقْوَى مِنَ اللَّهِ وَرِضْوَانٍ خَيْرٌ
أَمْ مَنْ أَسَّسَ بُنْيَانَهُ عَلَى شَفَا جُرُفٍ هَارٍ فَانْهَارَ بِهِ فِي نَارِ
جَهَنَّمَ وَاللَّهُ لا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ[ [ سورة التوبة : 109]

“क्या
ऐसा व्यक्ति बेहतर है जिसने अपना इमारत की बुनियाद अल्लाह से डरने (तक़्वा) और
उसकी प्रसन्नता पर रखी हो, या वह व्यक्ति कि जिसने अपनी इमारत की बुनियाद किसी
घाटी के किनारे रखी हो जो गिरने के कगार पर हो़, फिर वह उसे लेकर नरक की आग में
गिर पड़े, और अल्लाह तआला ऐसे ज़ालिमों को समझ ही नहीं देता।”  (सूरतुत तौबा: 109)

अतः, जिस व्यक्ति की शादी इस हराम आधार पर हुई
है वह तौबा (पश्चाताप) व इस्तिग़फार (क्षमायाचना) में जल्दी करे, और एक नये जीवन का
पुनः आरंभ करे जिसका आधार तक़्वा (ईश्भय, धार्मिकता) और अच्छे कर्म पर हो।

तथा प्रश्न संख्या (23420) का उत्तर भी देखें क्योंकि
उसमें अधिक लाभदायक बातें हैं।

अल्लाह सभी को उस चीज़ की तौफीक़ दे जिसे वह पसंद
करता और प्रसन्न होता है।