जिस व्यक्ति ने रोज़े की हालत में रमज़ान के महीने में सफर किया तो उसके लिए रोज़ा तोड़ देना बेहतर है या रोज़ा रखना ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा
और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

चारों इमाम, तथा सहाबा
व ताबेईन की बहुमत इस बात की ओर गई है कि यात्रा में रोज़ा रखना जाइज़, सही और मान्य
है, और यदि वह रोज़ा रखेगा तो उसका रोज़ा संपन्न होगा और उसके लिए पर्याप्त होगा। देखिए
: अल-मौसूअतुल फिक़हिय्या 28/73.

जहाँ तक सर्वश्रेष्ठ
और बेहतर पक्ष का प्रश्न है तो वह निम्नलिखित विस्तार के अनुसार है :


पहली स्थिति : जब रोज़ा रखना और रोज़ा तोड़ देना दोनों बराबर हों,
इसका अर्थ यह है कि रोज़ा उसे प्रभावित न करता हो, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए रोज़ा
रखना सर्वश्रेष्ठ है, जिसके निम्नलिखित प्रमाण हैं :

(क)
– अबू दर्दा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा :
“हम रमज़ान के महीने में
सख्त गर्मी के मौसम में अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ सफर में
निकले यहाँ तक कि हम में से एक व्यक्ति गर्मी की तेज़ी से अपने हाथ को अपने सिर पर रख
लेता था और हमारे बीच रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और अब्दुल्लाह बिन रवाहा
के सिवाय कोई रोज़े से नहीं था।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1945) और मुस्लिम (हदीस संख्या :
1122) ने रिवायत किया है।

(ख) – इसके द्वारा आदमी
अति शीघ्रता से भार-मुक्ति (ज़िम्मेदारी से बरी) हो जाता है ; क्योंकि क़ज़ा विलंब हो
जाता है, और अदायगी अर्थात रमज़ान के रोज़े रखना प्राथमिकता रखता है।

(ग) – वह अक्सर मुकल्लफ
पर आसान होता है ; क्योंकि लोगों के साथ रोज़ा रखना और रोज़ा तोड़ना, नये सिरे से रोज़ा
रखने से अधिक सरल और आसान है।

(घ) – वह फज़ीलत वाला
समय पा जाता है और वह रमज़ान का महीना है, क्योंकि रमज़ान का महीना अन्य दिनों से अधिक
फज़ीलत वाला है ; इसलिए कि वही अनिवार्यता का स्थान है। अतः इन प्रमाणों के कारण वह
बात संभावित है जिसकी ओर शाफई रहिमहुल्लाह गए हैं कि उस व्यक्ति के हक़ में रोज़ा रखना
सर्वश्रेष्ठ है जिसके लिए रोज़ा रखना और रोज़ा तोड़ देना दोनों बराबर है।

दूसरी स्थिति : रोज़ा
तोड़ देना उसके लिए अधिक आसानी का पात्र हो, तो ऐसी स्थिति में हम कहेंगे कि उसके लिए
रोज़ा तोड़ देना सर्वश्रेष्ठ है, और यदि रोज़ा उसके ऊपर कुछ कष्ट का कारण बनता है तो रोज़ा
रखना उसके हक़ में मक्रूह हो जायेगा ;

क्योंकि रूख्सत (छूट) के होते हुए भी कष्ट को
अपनाना अल्लाह सर्वशक्तिमान की रूख्सत से उपेक्षा करने को इंगित करता है।

तीसरी स्थिति : यात्रा
में रोज़ा रखना उसके लिए बहुत मुश्किल हो सहन करने के योग्य न हो, तो ऐसी स्थिति में
उसके हक़ में रोज़ा रखना हराम (निषिद्ध) है।

इस बात का प्रमाण वह
हदीस है जिसे मुस्लिम ने जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है
कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (मक्का पर) विजय के वर्ष (8 हिज्री में)
रमज़ान के महीने में मक्का मुकर्रमा की ओर निकले तो आप ने रोज़ा रखा यहाँ तक कि आप कुराउल
गमीम नामी स्थान – जो मक्का और मदीना के बीच एक जगह है – तक पहुँचे, तो लोगों ने भी
रोज़ा रखा। फिर आप ने पानी का एक प्याला मंगवाया और उसे ऊपर उठाया यहाँ तक कि लोगों
ने उसे देखा, फिर आप ने उसे पी लिया। इसके बाद आप से कहा गया कि : कुछ लोगों ने (अब
भी) रोज़ा रखा है। तो आप ने फरमाया : वो लोग अवज्ञाकारी हैं, वो लोग अवज्ञाकारी हैं।” तथा एक रिवायत के शब्द
यह हैं कि :
”तो आप से कहा गया कि : लोगों पर रोज़ा कष्ट और कठिनाई का कारण
बन गया है और वे देख रहे (प्रतीक्षा कर रहे) हैं कि आप क्या करते हैं। चुनाँचे आप ने
अस्र के बाद पानी का एक प्याला मंगवाया।” (हदीस संख्या : 1114) तो आप सल्लल्लाहु अलैहि
व सल्लम ने सख्त कठिनाई के बावजूद रोज़ा रखने वाले को अवज्ञाकारी कहा है। देखिए : अश्शर्हुल
मुम्ते लिश्शैख मुहम्मद बिन उसैमीन रहिमहुल्लाह 6/355.

“नववी और कमाल इब्नुल
हुमाम कहते हैं : जो हदीसें रोज़ा तोड़ने के सर्वश्रेष्ठ होने को दर्शाती हैं, वे उस
व्यक्ति पर लागू होती हैं जिसे रोज़े से हानि पहुँचती है, और उनमें से कुछ हदीसों में
इसे स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है, और इस अर्थ को लेना आवश्यक है, ताकि सभी हदीसों
के बीच समन्वय पैदा किया जा सके, और ऐसा करना कुछ हदीसों से उपेक्षा करने या बिना किसी
निश्चित प्रमाण के उसके निरस्त होने का दावा करने से बेहतर है। और जिन लोगों ने रोज़ा
रखने और रोज़ा तोड़ने को बराबर करार दिया है, उन्हों ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस
से दलील पकड़ी है कि (हमज़ा बिन अम्र अल-असलमी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम से पूछा कि क्या मैं यात्रा में रोज़ा रखूँ
ॽ – और वह बहुत यात्रा
करने वाले आदमी थे – तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : यदि तुम चाहो तो रोज़
रखो, और यदि चाहो तो रोज़ा तोड़ दो।) बुखारी व मुस्लिम।”