मैं एक कर्मचारी हूँ, मेरा मासिक वेतन 2,000 सऊदी रियाल है। परिवार के सभी सदस्य मेरे ऊपर निर्भर करते हैं और सभी खर्चे मैं अपने वेतन से देता हूँ। मेरे पास एक पत्नी, एक बेटी, मेरे मात पिता और भाई भहनें हैं जिन पर मैं खर्च करता हूँ।

लेकिन प्रश्न यह है कि मैं अपने माल की ज़कात कैसे दूँ जबकि मेरे धन का स्रोत केवल मेरा वेतन है, परन्तु मेरा संपूर्ण वेतन मेरे परिवार पर खर्च हो जाता है ? इसलिए मैं अपनी ज़कात कब दूँ ? कुछ लोगों का कहना है कि वेतन खेती की तरह है, उस में एक साल के बीतने का ऐतिबार नहीं है, इसलिए जब भी वेतन प्राप्त हो उस में ज़कात अनिवार्य है।

हर प्रकार की
प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए है।

जिस आदमी का मासिक
वेतन है, और वह उसे खर्च कर डालता है और उस में से कुछ भी नहीं बचता है इस प्रकार
कि महीने का अंत आने से पहले ही उस का माल समाप्त हो जाता है तो ऐसी स्थिति में उस
पर ज़कात अनिवार्य नहीं है, क्योंकि ज़कात में एक साल का बीतना ज़रूरी है। (अर्थात
निसाब की राशि का मालिक होने पर पूरे एक साल का बीतना)

इस आधार पर, ऐ
प्रश्न करने वाले! आप पर ज़कात अनिवार्य नहीं है, सिवाय इस के कि आप अपने माल से
इतनी राशि बचा कर रखते हों जो निसाब को पहुँच जाती हो और उस पर एक साल गुज़र जाये।

जहाँ तक उस आदमी
की बात का संबंध है जिस ने आप से यह कहा है कि वेतन की ज़कात खेती की ज़कात की तरह
है उस के लिए एक साल के बीतने की शर्त नहीं है, तो उस की बात सहीह नहीं है।

और जब कि तथ्य यह
है कि अधिकांश लोग वेतन पर काम करते हैं हमारे लिए उचित यह है कि हम वेतन से
संबंधित ज़कात निकालने के तरीक़े का उल्लेख कर दें:

कर्मचारी के वेतन
की ज़कात :

कर्मचारी की उस की
वेतन के साथ दो हालतें हैं :

पहली हालत : वह पूरी वेतन खर्च कर दे और उस में से कुछ भी न बचे, तो
ऐसी हालत में उस पर ज़कात अनिवार्य नहीं है, जैसाकि प्रश्न करने वाले की हालत है।

दूसरी हालत :  वह वेतन से एक
निश्चित राशि बचा लेता हो जो कभी बढ़ जाती हो और कभी काम हो जाती हो (अर्थात् जो
घटती और बढ़ती रहती है), तो ऐसी स्थिति में ज़कात का हिसाब कैसे किया जायेगा ?

इस का उत्तर यह है
कि : “अगर वह अपने हक़ में ठीक ठीक सर्वेक्षण करना चाहता है, वह चाहता है कि
सदक़ा के हक़दारों को सदक़ा से केवल उतनी ही दे जितना कि उन के लिए उस के माल में
ज़कात अनिवार्य है तो उसे चाहिए कि अपने लिए अपनी कमाई के हिसाब की एक सूची बना ले,
जिस में इस तरह की हर राशि को एक वर्ष के साथ विशिष्ट कर दे जिस की शुरूआत उस दिन
से करे जिस दिन से वह उस की मिल्कियत में आई है, और प्रत्येक राशि की ज़कात अलग-अलग
निकालता रहे जब भी उस पर अपने क़ब्ज़े में आने की तारीख से एक साल बीत जाये।

लेकिन अगर वह आराम
चाहता है और आसानी का रास्ता अपनाता है और उस का दिल इस बात से प्रस्न्न है कि वह
फक़ीरों और ज़कात के अन्य ह़क़दारों के पक्ष को अपने ऊपर प्राथमिकता दे, तो उस के पास
जितना भी पैसा है उन सब की ज़कात उसी समय निकाल दे जब उस निसाब (राशि) पर एक साल
बीत जाये जिस का वह सब से पहले मालिक हुआ है, और यह उस के अज्र व सवाब में अधिक
बढ़ोतरी करने वाला, उस के पद को अधिक ऊँचा करने वाला, उसे अधिक आराम पहुँचाने वाला
और फक़ीरों, मिसकीनों और ज़कात के अन्य हक़दारों के अधिकारों की सब से अधिक रक्षा
करने वाला है, और उस ने जो ज़कात निकाली है उस में से जो राशि उस राशि से अधिक है
जिस पर एक वर्ष बीत चुका है तो उसे, उस राशि की तरफ से जिस पर अभी एक वर्ष नहीं
बीता है, समय से पूर्ण ही भुगतान की गई ज़कात समझी जायेगी।”  स्थायी समिति के फतावा (9/280) से समाप्त हुआ।

उदाहरण के तौर पर
: उस ने मुहर्रम के महीने का वेतन प्राप्त किया और उस से एक हज़ार रियाल बचा कर रख
लिया, फिर सफर के महीने और उस के बाद बाक़ी महीनों के वेतन को प्राप्त किया . . जब
दूसरे साल मुहर्रम का महीना आ गया तो उस के पास जो कुछ भी राशि है उस का हिसाब
करेगा, फिर उस की ज़कात निकाल देगा।

और अल्लाह तआला ही
सर्वश्रेष्ठ जानता है।